कृष्ण पलायन: जब औरंगजेब की तलवार के सामने झुकी नहीं, बल्कि बची रही आस्था
भूमिका: जब आस्था के दीप बुझाने चली तलवार
वह दौर था दमन का… जब मुगल बादशाह औरंगजेब की तलवार हर उस जगह पर गरज रही थी, जहाँ भक्ति की लौ जलती थी।
इसी दौर में वृंदावन के गोविंददेव मंदिर में भक्ति का ऐसा दीप जल रहा था, जिसकी लौ आगरा से भी दिखाई देती थी।
मगर औरंगजेब ने आदेश दिया —
“उस मंदिर को जमीन के बराबर कर दो, हिंदोस्तान की कोई मस्जिद इतनी ऊंची नहीं है, तो बुतखाना इतना बुलंद कैसे हो सकता है?”
यह कहानी सिर्फ एक मंदिर की नहीं, बल्कि उस अमर आस्था की गाथा है जिसने तलवारों के बीच भी प्रभु को सुरक्षित रखा।
1. वृंदावन की रात — जब सेवायतों ने लिया निर्णय
गोविंददेव मंदिर में संध्या आरती हो रही थी।
शंख, मृदंग और करताल की धुन के बीच भक्त झूम रहे थे।
शिखर पर सवा मन घी का दीपक जल रहा था, जिसकी लौ आसमान चीर रही थी।
तभी खबर आई —
“बादशाह ने मंदिर गिराने का हुक्म दे दिया है, फौज परसों सुबह पहुंचेगी।”
मुख्य सेवायत शिवराम गोस्वामी ने दृढ़ स्वर में कहा —
“हम बादशाह से नहीं लड़ सकते, लेकिन गोविंददेव जी का विग्रह जरूर बचाएंगे।”
रात में ही तय हुआ — भगवान को हरे चारे में छिपाकर बैलगाड़ी से निकालना होगा।
चरवाहों के वेश में सेवायत निकले।
सिपाहियों की चौकियों से गुजरते हुए, गोविंददेव जी वृंदावन से निकल पड़े।
2. औरंगजेब की तोपें, मंदिर का गिरता शिखर
सुबह जब औरंगजेब की फौज पहुंची,
गोविंददेव मंदिर पर तोपें दागी गईं।
सात मंजिला मंदिर का शिखर भरभराकर गिर पड़ा।
भक्तों की आंखों में आंसू थे, पर गर्भगृह खाली मिला।
“हुजूर, मूर्तियां नहीं हैं… गर्भगृह खाली है!”
सिपाहियों ने रिपोर्ट दी, “काफिर मूर्तियां ले गए।”
लेकिन वो नहीं जानते थे —
भक्ति की लौ तलवार से नहीं बुझती।
3. राधाकुंड में गोविंददेव जी का प्रवास (13 वर्ष)
वृंदावन से करीब 25 किमी दूर राधाकुंड के पास शिवराम गोस्वामी ने प्रभु को छिपाया।
कहा —
“यहां जंगल और झाड़-झंखाड़ हैं, सिर्फ ग्वाले आते हैं, मुगलों को भनक नहीं लगेगी।”
13 साल तक गोविंददेव जी वहीं विराजे रहे।
फिर जब खबर औरंगजेब तक पहुंची, उसने फिर हुक्म दिया —
“अगर वो ऊंचे गोविंददेव की मूर्ति है, तो उसे तोड़ दो और टुकड़े मेरे पास लाओ।”
4. कामवन में गोविंददेव जी की नई लीला
राधाकुंड से खबर पहले ही आमेर के राजा कीरत सिंह तक पहुंच गई।
उन्होंने संदेश भेजा —
“गोविंददेव जी को कामवन लेकर आ जाइए।”
विग्रह वहां पहुंच गए।
कामवन के जाट सरदार चूड़ामन ने सालों तक विग्रह की रक्षा की।
मुगल सिपाही खाली हाथ लौटे, और औरंगजेब दांत पीसता रह गया।
5. आमेर से जयपुर तक — आस्था का अंतिम पड़ाव
1707 में औरंगजेब की मौत के बाद गोविंददेव जी को सांगानेर के पास गोविंदपुरा लाया गया।
फिर 1714 में सवाई जय सिंह ने उन्हें जयपुर के सिटी पैलेस के पास सूर्य महल में स्थापित कराया।
मंदिर बनने के बाद जयपुर में दीवाली-सा उत्सव मनाया गया।
राजा ने घोषणा की —
“आज से इस रियासत के राजा मैं नहीं, गोविंददेव जी होंगे।
मैं उनका दीवान रहूंगा, दरबार में मुख्य स्थान उनका होगा।”
पूरा आमेर “जय गोविंददेव” के नारों से गूंज उठा।
राजा ने खुद को पीछे कर भगवान को आगे कर दिया —
और उसी दिन से जयपुर का शासन गोविंददेव जी के नाम से चलने लगा।
6. जब तलवारें हार गईं और भक्ति जीत गई
आज भी जयपुर के सिटी पैलेस में गोविंददेव जी का मंदिर उसी गौरव की याद दिलाता है।
जहां कभी सात मंजिला मंदिर का शिखर गिराया गया था,
वहीं आज भी हर संध्या आरती में गूंजता है —
“ये लौ घी से नहीं, भक्ति से जलती है।”
औरंगजेब की तलवारें जंग खा गईं,
पर आस्था आज भी सोने-सी दमक रही है।
