चीन ने थोरियम से यूरेनियम बनाने में हासिल की सफलता, भारत के लिए बड़े अवसर

चीन ने थोरियम से यूरेनियम बनाने में हासिल की सफलता, भारत के लिए बड़े अवसर

04 नवंबर 2025 

चीन ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि दर्ज की है। शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड फिजिक्स, चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेस ने नया थोरियम आधारित मोल्टन साल्ट रिएक्टर (TMSR) विकसित किया है। यह 2 मेगावॉट का प्रयोगात्मक रिएक्टर थोरियम को यूरेनियम-233 में बदलने में सफल हुआ है। यह दुनिया का पहला वर्किंग थोरियम मोल्टन साल्ट रिएक्टर है।

चीन अब गोबी रेगिस्तान में 100 मेगावॉट का बड़ा रिएक्टर बना रहा है, जिसे 2035 तक व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार करने की योजना है। इस तकनीक से चीन को स्वच्छ, सस्ती और लगभग अनलिमिटेड ऊर्जा मिलने की संभावना है, जिससे वैश्विक स्तर पर परमाणु ऊर्जा का नया युग शुरू हो सकता है।

भारत के लिए अवसर

भारत के पास दुनिया का लगभग 25% थोरियम भंडार है, खासकर केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में। परमाणु खनिज निदेशालय (AMD) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 10.70 मिलियन टन मोनाजाइट है, जिसमें 9,63,000 टन थोरियम ऑक्साइड शामिल है। भारत अगर इस क्षेत्र में तेजी से कदम उठाए, तो थोरियम के सबसे बड़े वैश्विक निर्यातक और न्यूक्लियर ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी देश बन सकता है।

थोरियम की खासियत

थोरियम एक प्राकृतिक तत्व है और यूरेनियम से अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पाया जाता है। चीन के इनर मंगोलिया में थोरियम इतना है कि यह पूरे देश की ऊर्जा जरूरतें 1,000 साल तक पूरी कर सकता है। थोरियम खुद फिशन नहीं करता, लेकिन न्यूट्रॉन्स को एब्जॉर्ब करके यूरेनियम-233 में बदल जाता है, जो ऊर्जा उत्पादन के लिए ईंधन बनता है।

प्रक्रिया और रिएक्टर का काम

थोरियम-232 न्यूट्रॉन एब्जॉर्ब कर थोरियम-233 बनता है, जो प्रोटैक्टिनियम-233 में बदलता है और फिर यूरेनियम-233 बनता है। यह पूरा कन्वर्जन रिएक्टर के अंदर ही होता है।

रिएक्टर में थोरियम को फ्लोराइड साल्ट में घोलकर तरल ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। साल्ट ईंधन और कूलेंट दोनों का काम करता है। शुरुआत में थोड़ी मात्रा में यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम-239 डालकर न्यूक्लियर रिएक्शन शुरू किया जाता है। इसके बाद थोरियम लगातार यूरेनियम-233 में बदलकर ऊर्जा देता रहता है। इसे “बर्न व्हाइल ब्रीड” यानी बनाते हुए जलना कहते हैं।

इस रिएक्टर की खासियत यह है कि तरल ईंधन लगातार घूमता रहता है, इसलिए इसे बंद किए बिना नया ईंधन डाला जा सकता है। पारंपरिक रिएक्टरों की तरह बार-बार रोकने की जरूरत नहीं होती, जिससे ईंधन बचता है और रेडियोएक्टिव कचरा कम बनता है।

सुरक्षा और पर्यावरण

यह रिएक्टर सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल है। यह वायुमंडलीय दबाव पर चलता है, इसलिए विस्फोट का खतरा नहीं होता। पूरा सिस्टम अंडरग्राउंड है, और अगर साल्ट लीक होता है, तो यह ठंडा होकर ठोस बन जाता है और रेडिएशन वहीं रुक जाता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह रिएक्टर पानी पर निर्भर नहीं है। पारंपरिक न्यूक्लियर रिएक्टरों की तरह इसे ठंडा करने के लिए समुद्र या नदी की जरूरत नहीं होती। इसलिए इसे रेगिस्तानी और पहाड़ी क्षेत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है।

15 साल की मेहनत के बाद सफलता

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2011 में हुई थी। 15 साल की मेहनत के बाद 11 अक्टूबर 2023 को रिएक्टर ने पहली बार क्रिटिकलिटी हासिल की। 17 जून 2024 को यह फुल पावर पर चला और अक्टूबर 2024 में इसमें पहली बार थोरियम ईंधन डाला गया।

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