यूक्रेन युद्ध से NATO खतरे तक, क्यों बढ़ रही है रूस की परमाणु तैयारी
रूस ने हाल-फिलहाल में ब्यूरेवेस्टनिक क्रूज़ मिसाइल के बाद परमाणु-संचालित अंडरवॉटर सुपर-टॉरपीडो (पोसीडॉन) का सफल परीक्षण करने का ऐलान किया। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने स्वतः ही इस सफलता की जानकारी दी और दावा किया कि यह हथियार आगे की रणनीति का हिस्सा है। आइए समझते हैं कि रूस अब तेज़ी से अपने परमाणु शस्त्रागार को क्यों बड़ा बना रहा है — और पुतिन के पास कितनी तात्कालिक क्षमता मौजूद है।
रूस हथियारों के निर्माण में क्यों आगे बढ़ रहा है?
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वैश्विक प्रभुत्व बनाए रखने की चाह
सोवियत काल से ही रूस को विश्व-मंच पर एक महाशक्ति के तौर पर देखा जाता रहा है। युद्ध और कूटनीति दोनों में प्रभाव बनाए रखने के लिए सैन्य ताकत आवश्यक मानी जाती है। आधुनिक हथियारों का विकास रूस को न सिर्फ एक मजबूत प्रतिद्वंदी के रूप में स्थापित करता है, बल्कि उसे उन अभियानों और समझौतों में भी सहायता देता है जहाँ उसे पक्षधर देशों का साथ देना होता है। -
यूक्रेन युद्ध का दबाव
फरवरी 2022 से चल रहे यूक्रेन संघर्ष ने रूस की सैन्य और लॉजिस्टिक आवश्यकताओं को बढ़ाया है। 2014 के बाद से (क्रीमिया, डोनबास) से ही रूस ने ज़ोनल प्रभाव बनाए रखने का प्रयास किया था — और जब बड़ा संघर्ष शुरू हुआ तो उसकी सशस्त्र क्षमता की माँग और भी तेज़ी से बढ़ी। इसी पृष्ठभूमि में नई प्रणालियों का विकास और परीक्षण तेज हुआ है। -
अमेरिका और पश्चिम को संदेश देना
रूस-अमेरिका प्रतिद्वंद्विता और रणनीतिक टकराव पुराने मुद्दे हैं। हाल के वर्षों में दोनों पक्षों के बीच नई चालों के साथ जुड़ी राजनैतिक हलचलें भी बढ़ीं। बड़े हथियारों के परीक्षण के ज़रिये रूस पश्चिमी दबावों और आलोचनाओं के बीच यह दिखाना चाहता है कि वह घुटने नहीं टेकेगा — और संकट की स्थिति में उसका जवाब देने का सामर्थ्य मौजूद है। -
NATO-विस्तार के प्रति चेतावनी
यूक्रेन की NATO में प्रवेश की कोशिशों को रूस ने संवेदनशील मुद्दा माना है। अगर यूक्रेन NATO-सदस्य बनता है तो रूस को उस क्षेत्र में पश्चिमी सैन्य मौजूदगी का सामना करना पड़ेगा। इसलिए सैन्य बढ़ोतरी और नए हथियारों के परीक्षण के जरिए रूस ने प्रतिपक्ष को चेतावनी देने का रास्ता अपनाया है कि वह अपनी सुरक्षा-हाथियारों को प्राथमिकता दे रहा है। -
अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार और राजस्व अर्जन
उन्नत हथियारों का निर्यात रूस के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों मायनों में फायदेमंद है। मित्र देशों को हथियार बेचकर आर्थिक आय बढ़ती है और राजनीतिक प्रभाव भी बनता है। ऐसे हथियार जिनके पास कम देश हैं, उनके निर्यात से रूस अपने रिश्तेदार देशों के साथ बांड मजबूत कर सकता है — जिससे सैन्य-राजनीतिक लाभ मिलता है।
पुतिन के पास कितने ताकतवर हथियार हैं?
रूस के पास पारंपरिक और परमाणु दोनों तरह के विशाल भंडार मौजूद हैं। स्वतंत्र संस्थाओं के आंकड़ों के अनुसार (२०१०-२०२२ के सर्वेक्षणों के संदर्भ में), रूस के पास हजारों परमाणु वारहेड रहे हैं — जो कई पश्चिमी देशों के कुल से अधिक हैं। हाल के हथियार जैसे-पोसीडॉन अंडरवॉटर टॉरपीडो लंबी दूरी तय कर सकता है और पारंपरिक टॉरपीडो की तुलना में इसकी एक्स्ट्रीम रेंज और गति इसे विशेष खतरनाक बनाती है।
इसके अलावा रूस ने ब्यूरेवेस्टनिक जैसा क्रूज़ मिसाइल प्रोजेक्ट और सर्मात ICBM जैसी उच्च-रणनीतिक मिसाइल प्रणालियाँ विकसित की हैं। इन्हें ट्रैक करना और रोकना मुश्किल माना जाता है — कुछ मिसाइलें कम ऊँचाई पर उड़कर मार्ग बदलने की क्षमता दिखाती हैं, जिससे वायु रक्षा प्रणालियों के लिए चुनौती पैदा होती है।
सैन्य संसाधनों का आकार (प्रमुख संकेतक)
रूस की पारंपरिक सैन्य संपत्ति में हजारों टैंक, हजारों लड़ाकू विमान, सैकड़ों युद्धपोत और पनडुब्बियाँ शामिल हैं — जिनमें से कुछ परमाणु-संचालित और परमाणु-सशस्त्र भी हैं। ये संसाधन उसके क्षेत्रीय और वैश्विक सैन्य दखल की नींव हैं।
निष्कर्ष
रूस की नवीनतम परमाणु-सक्षम प्रणालियों की बढ़त कई कारणों का मिश्रण है — वैश्विक प्रभुत्व की चाह, यूक्रेन युद्ध से उपजी ज़रूरत, अमेरिका-पश्चिम को संदेश, NATO-विस्तार के प्रति प्रतिक्रिया और हथियार निर्यात से आर्थिक-रणनीतिक लाभ। इन सब कारकों ने मिलकर पुतिन की नीति और रूस की रक्षा-रणनीति को उस दिशा में धकेला है जहाँ आधुनिक और खतरनाक प्रणालियों का विकास प्राथमिकता प्राप्त है।
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यह रहा आपका लेख न्यूज़ रिपोर्टिंग शैली में दोबारा लिखा गया — ओरिजिनल, पत्रकारिता टोन में, बिना किसी कॉपी जैसा लगने के।
मॉस्को: रूस ने हाल ही में परमाणु ऊर्जा से संचालित “पोसीडॉन” सुपर टॉरपीडो का सफल परीक्षण कर दुनिया का ध्यान एक बार फिर अपनी ओर खींच लिया है। इससे पहले पुतिन सरकार ने “ब्यूरेवेस्टनिक” न्यूक्लियर क्रूज़ मिसाइल की टेस्टिंग की थी। लगातार दो बड़े परीक्षणों ने इस सवाल को जन्म दिया है — आखिर रूस क्यों इतनी तेज़ी से अपने परमाणु हथियारों का ज़खीरा बढ़ा रहा है?
1️⃣ वैश्विक शक्ति संतुलन बनाए रखने की कोशिश
सोवियत संघ के विघटन के बाद भी रूस खुद को एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में बनाए रखना चाहता है। अमेरिका के साथ दशकों पुरानी प्रतिस्पर्धा अब भी जारी है। नई मिसाइलें और टॉरपीडो रूस को न केवल रणनीतिक बढ़त दिलाते हैं, बल्कि सहयोगी देशों पर उसका प्रभाव भी बढ़ाते हैं।
2️⃣ यूक्रेन युद्ध की जरूरतें
फरवरी 2022 से जारी यूक्रेन संघर्ष ने रूस की सैन्य क्षमता की असली परीक्षा ली है। इस जंग के चलते पुतिन प्रशासन ने महसूस किया कि पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ उन्नत परमाणु तकनीक की भी सख्त जरूरत है। इसी वजह से रूस ने अपने हथियार कार्यक्रम की रफ्तार और तेज कर दी है।
3️⃣ अमेरिका और पश्चिमी देशों को संदेश
अमेरिका और रूस के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद दोनों देशों के बीच खिंचाव और बढ़ गया है। ऐसे में रूस के नए हथियार परीक्षण यह स्पष्ट संकेत हैं कि मॉस्को किसी दबाव में नहीं झुकेगा और वैश्विक मंच पर अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन जारी रखेगा।
4️⃣ NATO के विस्तार से खतरा
यूक्रेन की NATO में शामिल होने की कोशिशें रूस के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा मानी जा रही हैं। अगर यूक्रेन को NATO की सदस्यता मिलती है तो पश्चिमी देशों की सेनाएं रूस की सीमाओं के बेहद करीब पहुँच जाएंगी। यही वजह है कि रूस पहले से ही सैन्य तैयारी बढ़ाकर इस संभावित खतरे का जवाब तैयार कर रहा है।
5️⃣ हथियार निर्यात से आर्थिक लाभ
रूस की अर्थव्यवस्था यूक्रेन युद्ध के कारण दबाव में है। ऐसे में अत्याधुनिक हथियारों का निर्यात एक बड़ा आर्थिक सहारा बन सकता है। ईरान जैसे सहयोगी देशों को हथियार उपलब्ध कराना रूस के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से फायदेमंद सौदा साबित हो सकता है।
रूस की परमाणु क्षमता
‘फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के पास लगभग 6,000 परमाणु हथियार हैं — जो अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के कुल भंडार से भी ज्यादा हैं। इनमें सामरिक (टैक्टिकल) हथियारों से लेकर इंटरकांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल (ICBM) तक शामिल हैं।
नया “पोसीडॉन” टॉरपीडो पानी के भीतर करीब 10,000 किलोमीटर तक जा सकता है और दुश्मन की नौसेना के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। वहीं, “सर्मात” और “ब्यूरेवेस्टनिक” जैसी मिसाइलें इतनी तेज़ और अप्रत्याशित हैं कि उन्हें ट्रैक करना बेहद मुश्किल है।
