भारत क्यों घटा रहा है रूस से तेल आयात?
अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद बदली भारत की ऊर्जा रणनीति
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। लेकिन हाल ही में भारत को रूस से तेल खरीद में कमी करने पर मजबूर होना पड़ा है।
यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि अमेरिका के ताज़ा प्रतिबंधों का नतीजा है। आइए जानते हैं — आखिर क्या हुआ, किस पर असर पड़ा, और आगे भारत की रणनीति क्या होगी।
पाबंदियों की वजह क्या है?
22 अक्टूबर को अमेरिका ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों — Rosneft और Lukoil — पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।
दोनों कंपनियां रूस के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं और भारत इन्हीं से कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता रहा है।
इन प्रतिबंधों के बाद भारत की रिफाइनरियों ने सोचना शुरू किया कि कहीं वे अमेरिकी पाबंदियों की चपेट में न आ जाएं। इसी कारण अब रूस से तेल आयात घटाने या रोकने की तैयारी हो रही है।
रिलायंस की बड़ी भूमिका
Reliance Industries Ltd. (रिलायंस इंडस्ट्रीज) रूस से तेल खरीदने वाली भारत की प्रमुख निजी कंपनी रही है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस अब रूसी क्रूड ऑयल की खरीद में भारी कटौती या पूर्ण रोक लगाने की योजना बना रही है।
कंपनी ने बयान जारी कर कहा है —
“हम भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही रूसी तेल आयात करेंगे।”
यानी सरकार की विदेश नीति के अनुरूप ही आगे के फैसले होंगे।
सरकारी रिफाइनरियों की रणनीति
सरकारी रिफाइनरियां (जैसे इंडियन ऑयल, बीपीसीएल, एचपीसीएल) भी इस समय नई सप्लाई चेन तैयार करने में जुटी हैं।
लक्ष्य यह है कि उनकी कोई भी खेप सीधे Rosneft या Lukoil से न आए।
इससे वे अमेरिकी प्रतिबंधों से बच सकेंगी और अपनी ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित रख पाएंगी।
अमेरिका का दबाव और राजनीतिक पृष्ठभूमि
अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा है कि वह रूस से तेल आयात कम करे।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो यह तक कहा कि भारत “रूस की युद्ध मशीन” की मदद कर रहा है क्योंकि यह तेल राजस्व यूक्रेन युद्ध को फंड करता है।
इस दबाव के चलते अमेरिका ने भारत के कुछ सामानों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया है।
16 अक्टूबर को ट्रंप ने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस से तेल आयात घटाने पर सहमत हो गए हैं।
हालांकि भारत की ओर से विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था —
“भारत ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। हमारा उद्देश्य है कि कीमतें स्थिर रहें और सप्लाई सुचारू बनी रहे।”
मोदी–ट्रंप बातचीत और उसके बाद का असर
20 अक्टूबर की रात ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को दीवाली की बधाई दी और बातचीत में कहा कि भारत ने रूस से तेल आयात घटा दिया है।
इस बातचीत के बाद बाजारों में तेजी आई — क्योंकि अब ग्लोबल सप्लाई में कमी की आशंका बढ़ गई थी।
क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल
भारत की इस नीति परिवर्तन की खबर के बाद 23 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगभग 3% तक बढ़ गईं।
विश्लेषकों के मुताबिक, बाजार को डर है कि अगर रूस का निर्यात घटा तो वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा और दाम फिर से ऊपर जा सकते हैं।
आगे क्या?
भारत अब अपनी तेल खरीद को विविध स्रोतों से संतुलित करने की रणनीति अपना सकता है —
- मध्य पूर्व (सऊदी अरब, यूएई)
- अफ्रीका
- अमेरिका
इससे भारत ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखेगा और अंतरराष्ट्रीय दबाव से भी बचेगा।
