अल फलाह यूनिवर्सिटी पर जांच की आंच: दिल्ली ब्लास्ट के बाद फंडिंग, प्रबंधन और कैंपस कल्चर पर उठे सवाल

अल फलाह यूनिवर्सिटी पर जांच की आंच: दिल्ली ब्लास्ट के बाद फंडिंग, प्रबंधन और कैंपस कल्चर पर उठे सवाल

दिल्ली ब्लास्ट की जांच अब शिक्षा जगत तक पहुँच चुकी है। फरीदाबाद के मुस्लिम बहुल क्षेत्र धौज में स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी अब जांच एजेंसियों के घेरे में है। दिल्ली धमाके से जुड़े तीन डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद केंद्र सरकार ने इन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) को यूनिवर्सिटी की फंडिंग और विदेशी दान (FCRA) की जांच का आदेश दे दिया है।

पुलिस और NIA के सूत्रों के अनुसार, यह जांच सिर्फ आतंक मॉड्यूल तक सीमित नहीं है, बल्कि फंडिंग, फैकल्टी भर्ती और यूनिवर्सिटी के कैंपस कल्चर तक पहुंच चुकी है।


दिल्ली ब्लास्ट कनेक्शन

अब तक इस यूनिवर्सिटी से जुड़े जिन नामों पर कार्रवाई या जांच चल रही है, वे हैं:

  • डॉ. मुजम्मिल शकील

  • डॉ. शाहीन सईद

  • डॉ. उमर नबी (मृत)

  • डॉ. निसार-उल-हसन — जिन्हें 2023 में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (LG) द्वारा टेरर लिंक्स के लिए बर्खास्त किया गया था, फिर भी अल फलाह यूनिवर्सिटी में उन्हें प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया।

इन सब नामों के सामने आने के बाद, ED और अन्य केंद्रीय एजेंसियां अब यूनिवर्सिटी के वित्तीय स्रोतों और स्टाफ़ चयन प्रक्रिया की गहराई से जांच कर रही हैं।


1. मान्यता का झूठा दावा

यूनिवर्सिटी की वेबसाइट फिलहाल बंद है। पहले इस पर यह दावा किया जाता था कि संस्थान को NAAC+ मान्यता प्राप्त है। लेकिन गुरुवार को NAAC (National Assessment and Accreditation Council) ने अल फलाह को झूठे दावे के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

यह सवाल खड़ा करता है कि यूनिवर्सिटी की पारदर्शिता और शैक्षणिक प्रमाणन कितने विश्वसनीय हैं।


2. स्टूडेंट्स का डेटा और संचालन की अस्पष्टता

अल फलाह यूनिवर्सिटी में कितने विद्यार्थी पढ़ते हैं, इसका कोई आधिकारिक डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
हालांकि, संस्थान में लगभग 4 कॉलेज और 800+ बेड वाला अस्पताल बताया जाता है।

यहां निम्नलिखित कोर्स चलते हैं:

  • मेडिकल: MBBS (200 सीटें), MD/MS (50 सीटें), BDS, B.Pharm

  • इंजीनियरिंग: B.Tech (CS, Mechanical, Civil)

  • सोशल साइंसेस: BA (English, Urdu, History, Journalism)

  • अन्य: डिप्लोमा, PhD, स्कॉलरशिप स्कीम्स


3. विदेशी फंडिंग पर संदेह

सूत्रों के अनुसार, यूनिवर्सिटी को अरब देशों से हर वर्ष दान प्राप्त होता है।
फंडरेज़र साल में एक बार कैंपस आते हैं।
अब NIA यह जांच रही है कि कहीं इस विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग तो नहीं हुआ।

फिलहाल 10 सालों के FCRA रिकॉर्ड्स और वित्तीय फाइलिंग्स सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध नहीं हैं — जिससे संदेह और गहराता है।


4. वित्तीय रिकॉर्ड्स गायब

FCRA पोर्टल पर अल फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट का कोई अद्यतन डेटा नहीं मिला।
ED को अब यह पता लगाना है कि क्या यूनिवर्सिटी की फंडिंग वैध स्रोतों से हुई थी या किसी विदेशी नेटवर्क के जरिए इसकी फाइनेंसिंग हुई।


5. कैंपस में संदिग्ध गतिविधियाँ

जांच रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैंपस में इस्लामिक स्टूडेंट्स ग्रुप्स सक्रिय हैं, जो धार्मिक सेमिनार आयोजित करते हैं।
इन आयोजनों में विदेशी वक्ता भी बुलाए जाते हैं और विषय आमतौर पर “इस्लामिक एजुकेशन और सोशल स्टडीज” से जुड़े होते हैं।

अस्पताल की आखिरी सरकारी जांच 2019 में हुई थी, जो अब तक अपडेट नहीं हुई है।


6. प्रबंधन और चांसलर पर सवाल

अल फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट के फाउंडर और चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी हैं।
वे अल फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं।

ट्रस्टी बोर्ड में उनके परिवार के सदस्य — सुफयान अहमद सिद्दीकी और फरहीन बेग — भी शामिल हैं।
जवाद सिद्दीकी का नाम पुराने फ्रॉड और लीगल केसों से जुड़ा रहा है।

यह भी सामने आया है कि कई फैकल्टी सदस्यों का बैकग्राउंड संदिग्ध है, और नियुक्ति के समय बैकग्राउंड वेरिफिकेशन प्रक्रिया कमजोर रही है।


7. विवादित बैकग्राउंड वाले डॉक्टरों की भर्ती

तीन डॉक्टर — डॉ. मुजम्मिल शकील, डॉ. शाहीन सईद, और डॉ. उमर नबी — सभी अल फलाह मेडिकल कॉलेज से जुड़े थे।
डॉ. निसार-उल-हसन को J&K प्रशासन ने टेरर लिंक्स के कारण निकाला था, फिर भी उन्हें यहां नौकरी मिली।

जांच एजेंसियों का दावा है कि इनमें से कई पहले विवादित NGO और इस्लामिक नेटवर्क्स से जुड़े थे।
मेडिकल फैकल्टी में 20% से अधिक डॉक्टर जम्मू-कश्मीर से हैं, जिनकी सुरक्षा स्क्रीनिंग “कमजोर” बताई गई है।


8. अब तक की जांच कार्रवाई

दिल्ली पुलिस, हरियाणा पुलिस, NIA और ED — चारों एजेंसियाँ अब तक 50 से अधिक लोगों से पूछताछ कर चुकी हैं।
जांच के दायरे में यूनिवर्सिटी की फंडिंग, प्रबंधन, स्टाफ चयन, और छात्र गतिविधियाँ हैं।

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